NCERT Class 10 Geography Chapter 1 – Resources and Development Notes in Hindi

NCERT Class 10 Geography Chapter 1 – Resources and Development Notes in Hindi

नमस्ते प्रिय विद्यार्थियों! एक वरिष्ठ भूगोल शिक्षक के रूप में, मैं इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कक्षा 10 के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक—’संसाधन एवं विकास’ की गहराई से सैर पर ले चलूँगा। भूगोल केवल मानचित्रों और आँकड़ों का नाम नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के आधार—’संसाधनों’ को समझने का विज्ञान है।

प्रकृति में उपलब्ध हर वह वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है, संसाधन कहलाती है। लेकिन याद रहे, किसी भी पदार्थ को ‘संसाधन’ की श्रेणी में आने के लिए इन चार तत्वों का होना अनिवार्य है:

1. उपयोगिता (Utility): वह वस्तु मानव की किसी न किसी ज़रूरत को पूरा करती हो।

2. मूल्य (Value): उस वस्तु का आर्थिक या सामाजिक महत्व हो।

3. तकनीकी ज्ञान (Technical Know-how): उसे उपयोग करने की तकनीक हमारे पास हो।

4. संस्कृति (Culture): समाज और समय के अनुसार उसकी स्वीकार्यता हो।

1. संसाधन: अर्थ एवं विशेषताएँ

संसाधन वे प्राकृतिक या मानव-निर्मित वस्तुएं हैं जो मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि करती हैं। इनकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

• प्रकृति में सीमित (Limited in Nature): अधिकांश संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, इसलिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है।

• सापेक्षता (Relativity): संसाधन स्थान और समय के अनुसार बदलते रहते हैं। एक समय जो वस्तु बेकार थी, तकनीक आने पर वह संसाधन बन जाती है।

• परस्पर निर्भरता (Interdependence): संसाधन आपस में जुड़े होते हैं। यदि हम जल संसाधन को प्रदूषित करते हैं, तो इसका प्रभाव कृषि और जैव विविधता दोनों पर पड़ता है।

• विकासशीलता (Developability): तकनीक और शोध के माध्यम से हम लगातार नए संसाधनों की खोज और विकास करते रहते हैं।

2. संसाधनों का विस्तृत वर्गीकरण

संसाधनों को उनकी उत्पत्ति, उपलब्धता और स्वामित्व के आधार पर निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया गया है:

2.1 उत्पत्ति के आधार पर (On the basis of Origin)

प्रकार

विशेषताएँ

उदाहरण

जैव संसाधन (Biotic)

सजीव स्रोतों से प्राप्त और पुनः उत्पन्न होने वाले।

वन, वन्यजीव, मानव, मत्स्य, और जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम)।

अजैव संसाधन (Abiotic)

निर्जीव स्रोतों से प्राप्त संसाधन।

भूमि, जल, धातु (लोहा, ताँबा), वायु, सौर ऊर्जा।

शिक्षक की टिप: ध्यान दें कि कोयला और पेट्रोलियम ‘जैव संसाधन’ माने जाते हैं क्योंकि इनका निर्माण लाखों साल पहले जीवित प्राणियों के अवशेषों के दबने से हुआ है।

2.2 नवीकरणीयता के आधार पर (On the basis of Exhaustibility)

प्रकार

विशेषताएँ

उदाहरण

नवीकरणीय (Renewable)

प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः प्राप्त किए जा सकते हैं।

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन।

अनवीकरणीय (Non-renewable)

सीमित मात्रा में, एक बार उपयोग के बाद समाप्त।

कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, खनिज।

2.3 स्वामित्व के आधार पर (On the basis of Ownership)

• व्यक्तिगत संसाधन: निजी स्वामित्व वाले, जैसे—किसी का घर, कुआँ या किसान की अपनी जमीन।

• सामुदायिक संसाधन: समुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध, जैसे—गाँव के चारागाह, श्मशान भूमि या सार्वजनिक पार्क।

• राष्ट्रीय संसाधन: देश की सीमा के भीतर के सभी संसाधन। तकनीकी रूप से देश की पूरी भूमि और जल क्षेत्र राष्ट्र की संपत्ति है।

• अंतर्राष्ट्रीय संसाधन: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नियंत्रण वाले संसाधन, जैसे—खुले समुद्र के संसाधन और अंटार्कटिका।

2.4 विकास के स्तर के आधार पर (On the basis of Status of Development)

1. संभावित (Potential): जो मौजूद हैं पर अभी उपयोग नहीं हुए (जैसे राजस्थान और गुजरात में सौर एवं पवन ऊर्जा)।

2. विकसित (Developed): जिनका सर्वेक्षण और गुणवत्ता का निर्धारण हो चुका है।

3. भंडार (Stock): पदार्थ मौजूद हैं पर तकनीकी ज्ञान के अभाव में उपयोग नहीं हो पा रहे (जैसे जल से ऊर्जा हेतु हाइड्रोजन निकालना)।

4. संचित कोष (Reserves): भंडार का वह हिस्सा जिसे वर्तमान तकनीक से भविष्य की जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा गया है।

3. संसाधन विकास और सतत विकास

संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कई गंभीर समस्याओं को जन्म देता है:

पर्यावरणीय प्रदूषण: वायु, जल और भूमि की गुणवत्ता में गिरावट।

• पारिस्थितिक असंतुलन: वनों की कटाई से जैव विविधता का ह्रास।

• वैश्विक तापन (Global Warming): ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि।

सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development): 1987 के ब्रंटलैंड आयोग के अनुसार: “ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करे।” इसका उद्देश्य पर्यावरणीय गुणवत्ता का संरक्षण और दीर्घकालीन सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है।

सतत विकास की रणनीतियाँ:

• पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ावा देना।

• वनीकरण और जनसंख्या नियंत्रण।

• नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना।

• पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता।

4. संसाधन नियोजन (Resource Planning)

संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए बनाई गई रणनीति को ‘संसाधन नियोजन’ कहते हैं।

नियोजन के तीन चरण:

1. पहचान एवं सूचीकरण: संसाधनों का सर्वेक्षण, मानचित्रण और गुणात्मक मापन करना।

2. विकास योजना ढाँचा: उपयुक्त तकनीक, कौशल और संस्थागत ढाँचा तैयार करना।

3. क्रियान्वयन: योजनाओं को राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के साथ एकीकृत करना।

भारत के संदर्भ में महत्व: भारत में संसाधनों का वितरण बहुत असमान है, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होता है। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ खनिजों में समृद्ध है, जबकि राजस्थान में सौर ऊर्जा अधिक है लेकिन जल की भारी कमी है। इस असमानता को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन अनिवार्य ।

5. भूमि संसाधन एवं उपयोग प्रारूप

भूमि एक सीमित और महत्वपूर्ण संसाधन है। भारत में भूमि उपयोग का प्रारूप (Land Use Pattern) इस प्रकार है:

• शुद्ध बोया क्षेत्र (Net Sown Area): लगभग 54% (जहाँ खेती होती है)।

• वन भूमि (Forest Land): लगभग 22% (पारिस्थितिक संतुलन के लिए आदर्श स्तर 33% होना चाहिए)।

• गैर-कृषि उपयोग (सड़क, उद्योग, आवास): लगभग 8%।

• बंजर एवं अपर्यावर्ती भूमि (Barren Land): लगभग 6%।

• अन्य (अनुपयोगी भूमि) (Other Uncultivated Land): लगभग 6%।

• चारागाह (Pasture Land): लगभग 4%। (कुल योग = 100%)

6. भूमि क्षरण एवं संरक्षण उपाय

मानवीय गतिविधियों के कारण भूमि की उत्पादकता में कमी आना ‘भूमि क्षरण’ कहलाता है।

• प्रमुख कारण:

    ◦ वनोन्मूलन एवं खनन: झारखंड और छोटानागपुर पठार जैसे क्षेत्रों में खनन से भूमि का भारी नुकसान हुआ है।

    ◦ अति पशुचारण: गुजरात और राजस्थान में मुख्य समस्या।

    ◦ अत्यधिक सिंचाई: पंजाब और हरियाणा में सिंचाई के कारण जल भराव (Waterlogging) और लवणीकरण (Salinization) की समस्या पैदा होती है।

• संरक्षण के उपाय:

    ◦ रक्षक मेखला (Shelter Belts): पेड़ों की कतारें लगाकर पवन वेग कम करना।

    ◦ वनीकरण: बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण।

    ◦ पशुचारण पर नियंत्रण और बंजर भूमि का पुनरुद्धार।

7. मृदा: प्रकार और संरक्षण

मृदा निर्माण को मूल शैल, जलवायु, स्थलाकृति और समय जैसे कारक प्रभावित करते हैं।

भारत की प्रमुख मृदाओं का विवरण:

मृदा का प्रकार

प्रमुख क्षेत्र

मुख्य विशेषता

मुख्य फसलें

जलोढ़ मृदा

उत्तरी मैदान, तटीय मैदान

नदियों द्वारा निर्मित, बालू-गाद का मिश्रण

गेहूँ, धान, गन्ना

काली मृदा (रेगुर)

दक्कन पठार (महाराष्ट्र, गुजरात)

लावा से निर्मित, नमी धारण की उच्च क्षमता

कपास, सोयाबीन

लाल-पीली मृदा

ओडिशा, छत्तीसगढ़

लोह ऑक्साइड के कारण लाल रंग

बाजरा, रागी, आलू

लेटराइट मृदा

भारी वर्षा वाले क्षेत्र (केरल)

सिलिका का निक्षालन (Leaching), कम उपजाऊ

चाय, काजू, रबर

मरुस्थलीय मृदा

राजस्थान, गुजरात

रेतीली, नमी और कार्बनिक पदार्थों की कमी

ज्वार, बाजरा

पर्वतीय मृदा

हिमालय क्षेत्र

कम गहरी, कंकरीली, वनस्पति अवशेष युक्त

चाय, फल, मसाले

मृदा अपरदन एवं संरक्षण: अपरदन के प्रमुख प्रकार:

1. शीट अपरदन (Sheet Erosion): ऊपरी परत का समान रूप से बहना।

2. गल्ली अपरदन (Gully Erosion): गहरी नालियाँ बनना। इसका प्रमुख उदाहरण चंबल बेसिन की बीहड़ भूमि (Ravines) है।

3. पवन अपरदन: हवा द्वारा धूल का उड़ना।

संरक्षण की विधियाँ:

• सोपानिक कृषि (Terrace Farming): पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेती।

• समोच्चरेखीय जुताई (Contour Ploughing): ढाल के समानांतर हल चलाना।

• पट्टीदार कृषि (Strip Cropping): फसलों की पट्टियाँ बोना।

• अवरोधक (रॉक डैम) बनाना: नालियों के बहाव को रोकने के लिए।

• वनीकरण (Afforestation): मिट्टी को बांधने के लिए वृक्ष लगाना।

8. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण शब्दावली (Glossary)

• भंडार (Stock): वे पदार्थ जो उपलब्ध हैं पर उपयुक्त तकनीक के अभाव में उपयोग नहीं हो पा रहे।

• संचित कोष (Reserves): भंडार का वह भाग जिसे भविष्य में वर्तमान तकनीक से प्रयोग किया जा सकता है।

• पुनर्चक्रण (Recycling): उपयोग की गई वस्तुओं से फिर से कच्चा माल प्राप्त करना।

• जैव विविधता (Biodiversity): किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली सजीवों की विभिन्न प्रजातियाँ।

• भूमि क्षरण (Land Degradation): मानवीय या प्राकृतिक कारणों से भूमि की गुणवत्ता में ह्रास।

निष्कर्ष

संसाधन हमारी प्रगति का इंजन हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पृथ्वी हमें केवल हमारी जरूरतों के लिए संसाधन देती है, लालच के लिए नहीं। भविष्य की पीढ़ियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए हमें ‘सतत विकास’ को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए।

छात्रों के लिए संदेश: संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए भी आवश्यक है। अपनी पढ़ाई जारी रखें और पर्यावरण के रक्षक बनें!

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